एक शांत गाँव में अनन्या नाम की एक लड़की अपने दादाजी माधव के साथ रहती थी। माधव बहुत ही ज्ञानी और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। एक दिन गाँव का सबसे अमीर आदमी, विक्रम, उनके घर आया। विक्रम को अपनी दौलत पर बहुत घमंड था और वह चाहता था कि लोग उसके पैसे के कारण उसके गुलाम बने रहें।
विक्रम ने माधव से कहा, 'माधव, आप बहुत बुद्धिमान हैं। मेरे साथ काम कीजिए, मैं आपको बहुत सारा सोना दूँगा। धन होने पर दुनिया आपके कदमों में होगी।'
अनन्या को यह समझ नहीं आया। उसने अपने दादाजी से पूछा, 'दादाजी, आप उसकी दौलत क्यों नहीं लेते? इससे तो हमारा जीवन आसान हो जाएगा।'
माधव धीरे से मुस्कुराए और बोले, 'अनन्या, विक्रम केवल धन को ही सब कुछ मानता है। वह लोगों को अपने पैसे से खरीदना चाहता है। लेकिन जो लोग दया, प्रेम और ज्ञान की दौलत की तलाश में होते हैं, वे उन लोगों के एहसान नहीं चाहते जो केवल धन को ही अपना लक्ष्य मानते हैं। यदि हम ऐसे लोगों के पीछे चलेंगे जो केवल लाभ देखते हैं, तो हम अपना आत्मसम्मान खो देंगे।'
समय बीतने के साथ, जब विक्रम की दौलत कम हुई, तो उसके तथाकथित दोस्त भी उसे छोड़कर चले गए। लेकिन माधव को गाँव के लोग बहुत सम्मान देते थे। अनन्या ने सीखा कि असली धन जेब में नहीं, बल्कि इंसान के चरित्र में होता है।