एक सुंदर से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। उसके पिता, श्री राघव, गाँव के सबसे सम्मानित और ईमानदार व्यक्ति थे। गाँव के लोग उन्हें एक ऊँचे पर्वत की तरह सम्मान देते थे। अर्जुन भी अपने पिता की तरह महान बनना चाहता था।
एक दिन गाँव के मेले में, अर्जुन को एक कीमती चाँदी का हार मिला। लालच में आकर उसने सोचा, 'इसे कोई नहीं देख रहा है,' और उसने उसे अपनी जेब में छिपा लिया।
अगले दिन पूरा गाँव उस हार के खोने से परेशान था। अर्जुन ने देखा कि उसके पिता, जो अपनी ईमानदारी के लिए जाने जाते थे, उस हार को खोजने में सबकी मदद कर रहे थे। अर्जुन को अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ। उसे लगा कि उसकी एक छोटी सी गलती उसके पिता की बरसों की कमाई हुई इज्जत को मिट्टी में मिला देगी।
अंत में, अर्जुन ने अपने पिता को सब सच बता दिया। उसके पिता ने उसे डाँटने के बजाय प्यार से समझाया, 'बेटा, एक विशाल पर्वत कितना भी ऊँचा क्यों न हो, अगर उस पर थोड़ी सी गंदगी लग जाए, तो उसकी सुंदरता कम हो जाती है। वैसे ही, एक इंसान चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, एक गलत काम उसकी प्रतिष्ठा को गिरा देता है।'
अर्जुन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने हार वापस कर दिया और माफी माँगी। उस दिन से उसने जीवन में हमेशा सच्चाई के रास्ते पर चलने का संकल्प लिया।