एक सुंदर गाँव में अर्जुन और विक्रम नाम के दो मित्र रहते थे। अर्जुन बहुत प्रतिभाशाली था, लेकिन वह बहुत ही विनम्र स्वभाव का था। वहीं विक्रम हमेशा अपनी प्रशंसा खुद ही करता रहता था और कहता था कि वह सबसे श्रेष्ठ है।
एक बार गाँव में चित्रकला प्रतियोगिता आयोजित की गई। अर्जुन ने एक सुंदर प्राकृतिक दृश्य बनाया, जबकि विक्रम ने एक शक्तिशाली योद्धा का चित्र बनाया। प्रतियोगिता समाप्त होते ही विक्रम चिल्लाने लगा, "मेरा चित्र देखो! मेरे जैसा कलाकार इस गाँव में कोई नहीं है! मैं सबसे महान हूँ!" लेकिन अर्जुन चुपचाप बैठा रहा।
जब विजेताओं की घोषणा हुई, तो अर्जुन को प्रथम पुरस्कार मिला। विक्रम गुस्से में आ गया और बोला, "यह गलत है! मैं ही सबसे अच्छा हूँ!"
गाँव के एक बुजुर्ग ने विक्रम को समझाया, "बेटा, बड़े पेड़ फलों से लदे होने पर झुक जाते हैं, लेकिन छोटे और बेकार पौधे अकड़कर खड़े रहते हैं। अर्जुन ने अपनी कला के साथ विनम्रता भी दिखाई, इसीलिए वह सच्चा विजेता बना।"
विक्रम को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने समझ लिया कि खुद की तारीफ करना महानता नहीं, बल्कि विनम्रता ही असली महानता है।