एक छोटे से गाँव में अर्जुन और विक्रम नाम के दो मित्र रहते थे। अर्जुन बहुत ही शांत और नेक दिल का था, जबकि विक्रम थोड़ा घमंडी स्वभाव का था। एक शाम, गाँव के उत्सव की तैयारी के दौरान, विक्रम से गलती से गाँव के मुखिया जी का एक बहुत ही कीमती मिट्टी का दीया टूट गया।
विक्रम बुरी तरह डर गया। उसने सोचा, 'अगर किसी को पता चला तो सब मेरा मज़ाक उड़ाएंगे। मैं चुपचाप यहाँ से निकल जाता हूँ।' अर्जुन ने यह सब देख लिया था। अर्जुन ने विक्रम की गलती का ढिंढोरा पीटने के बजाय, उसके पास जाकर धीरे से कहा, 'घबराओ मत विक्रम, हम मिलकर इसे ठीक करने की कोशिश करेंगे या मुखिया जी से सच बोलकर माफी मांग लेंगे।'
विक्रम चाहता तो किसी और पर इल्जाम लगा सकता था, लेकिन अर्जुन ने अपने मित्र की इज्जत बचाने के लिए उसकी गलती को गुप्त रखा। बाद में जब मुखिया जी को पता चला, तो उन्होंने अर्जुन की प्रशंसा की क्योंकि उसने किसी की बुराई फैलाने के बजाय सुधारने का रास्ता दिखाया। विक्रम को समझ आ गया कि दूसरों की कमियाँ निकालने वाला छोटा होता है, और उन्हें ढंकने वाला महान।