एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। एक दोपहर, अर्जुन अपने दोस्त रोहन के साथ फुटबॉल खेल रहा था। तभी उसने देखा कि पड़ोस के बुजुर्ग, श्री राघव, सब्जियों की एक भारी टोकरी लेकर जा रहे थे और अचानक उनका पैर फिसल गया। टोकरी गिर गई और सारी सब्जियाँ सड़क पर बिखर गईं।
अर्जुन ने बिना सोचे अपना खेल छोड़ दिया और दौड़कर राघव जी की मदद करने पहुँचा। उसने उन्हें उठने में मदद की और सारी सब्जियाँ वापस टोकरी में रख दीं। रोहन ने हैरान होकर पूछा, "अर्जुन, तुमने खेल क्यों रोक दिया? हम तो गोल करने वाले थे!"
अर्जुन मुस्कुराया और बोला, "रोहन, मुझे यह बोझ नहीं लगा। मुझे बस लगा कि यह करना मेरा फ़र्ज़ है।"
उस शाम अर्जुन के पिता ने उसे समझाया, "बेटा, जब हम अपने कर्तव्यों को समझ लेते हैं, तो भलाई करना हमें कठिन काम नहीं लगता। यह हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाता है, जैसे सांस लेना।" अर्जुन समझ गया कि दूसरों की मदद करना कोई एहसान नहीं, बल्कि एक अच्छे इंसान का स्वाभाविक गुण है।