बहुत समय पहले, विक्रम नाम का एक पराक्रमी राजकुमार था। उसे अपनी शक्ति और युद्ध जीतने की क्षमता पर बहुत घमंड था। एक बार, अपने राज्य का विस्तार करने के लिए वह अपनी सेना के साथ एक घाटी से गुजर रहा था। एक छोटे से गाँव के पास, माधव नाम के एक वृद्ध किसान ने उसे रोका और कहा, 'राजकुमार, कृपया अपने घोड़ों को इस खेत से न ले जाएँ, मिट्टी बहुत नरम है और हमारी फसलें बर्बाद हो जाएँगी।'
विक्रम को बहुत गुस्सा आया। उसने चिल्लाकर कहा, 'मैं एक विजेता हूँ! क्या मुझे एक साधारण किसान की बात सुननी चाहिए?' तभी उसके गुरु, राघव ने धीरे से कहा, 'राजकुमार, असली ताकत दूसरों को दबाने में नहीं, बल्कि दूसरों की जरूरतों का सम्मान करने और झुकने में है।'
विक्रम ने सोचा और अपनी सेना को दूसरे रास्ते से ले जाने का आदेश दिया। गाँव वालों ने उसकी इस दयालुता को देखकर उसका दिल से सम्मान किया। बाद में, जब एक पड़ोसी राज्य ने हमला किया, तो उन्हीं ग्रामीणों ने विक्रम की गुप्त रूप से मदद की। विक्रम समझ गया कि तलवार से ज्यादा शक्तिशाली विनम्रता का हथियार होता है।