एक सुंदर से गाँव में सोमनाथ नाम का एक बहुत अमीर व्यापारी रहता था। उसके पास बहुत सारी ज़मीन, सोना और एक बड़ा महल था। लेकिन सोमनाथ की एक बुरी आदत थी—वह कभी किसी की मदद नहीं करता था। वह हमेशा सोचता था कि उसने यह सब मेहनत से कमाया है और इसे केवल अपने सुख के लिए ही इस्तेमाल करना चाहिए।
उसका बेटा आर्यन बहुत दयालु था। एक बार गाँव में भयंकर सूखा पड़ा। लोग खाने-पीने के लिए तरसने लगे। आर्यन ने अपने पिता से कहा, "पिताजी, हमारे पास बहुत सारा अनाज है, हमें इसे भूखे लोगों में बाँट देना चाहिए।"
सोमनाथ ने गुस्से में कहा, "नहीं आर्यन! यह धन मैंने कमाया है और मैं इसे केवल अपने लिए रखूँगा।"
कुछ समय बाद सोमनाथ बहुत बीमार पड़ गया। वह अपने बड़े से महल में अकेला लेटा हुआ था। उसे बहुत अकेलापन महसूस हो रहा था। आर्यन ने उसके पास बैठकर कहा, "पिताजी, यदि आपने अपनी संपत्ति का उपयोग दूसरों की भलाई के लिए नहीं किया, तो इस धन का कोई अर्थ नहीं है। ऐसा व्यक्ति जो धन तो रखता है पर उसे बाँटता नहीं, वह जीवित होकर भी मृत समान है।"
सोमनाथ को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने अपने धन से गाँव में कुएँ खुदवाए और गरीबों को भोजन कराया। जब उसने लोगों के चेहरों पर मुस्कान देखी, तब उसे समझ आया कि असली खुशी बाँटने में है।