एक छोटे से गाँव में आर्यन नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत ही शर्मीला स्वभाव का था। जब भी स्कूल में कोई उसकी तारीफ करता, वह शर्म से लाल हो जाता और सिर झुका लेता। सब उसे बहुत ही संस्कारी लड़का मानते थे।
एक शाम आर्यन जंगल के रास्ते घर लौट रहा था। अचानक उसकी नज़र घास पर पड़ी एक सोने की घड़ी पर पड़ी। उसने इधर-उधर देखा, वहाँ कोई नहीं था। एक पल के लिए उसके मन में आया, 'कोई देख नहीं रहा है, मैं इसे रख सकता हूँ।' लेकिन अगले ही पल उसे एक अजीब सी बेचैनी हुई। यह डर किसी इंसान का नहीं था, बल्कि उसके अपने मन का था। उसे लगा कि अगर उसने यह घड़ी ली, तो उसका अपना मन उसे कभी माफ नहीं करेगा।
आर्यन ने घड़ी उठाई और वहीं रुक गया। थोड़ी देर बाद एक बुजुर्ग व्यक्ति परेशान होकर घड़ी ढूंढते हुए वहाँ आए। आर्यन ने घड़ी उन्हें सौंप दी। बुजुर्ग ने हैरान होकर पूछा, 'बेटा, तुम्हें तो कोई देख नहीं रहा था, फिर तुमने इसे क्यों नहीं रख लिया?' आर्यन ने विनम्रता से कहा, 'बाबा, लोगों के सामने मुझे शर्म आती है, लेकिन अपने मन के सामने मुझे लज्जा आती है। मैं अपने मन के सामने शर्मिंदा नहीं होना चाहता।' आर्यन की बात सुनकर बुजुर्ग का सिर गर्व से ऊँचा हो गया।