एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। अर्जुन बुद्धिमान तो था, लेकिन उसमें एक कमी थी—उसे इस बात की परवाह नहीं थी कि उसके शब्दों से दूसरों को कितनी चोट पहुँचती है। एक दिन स्कूल में, जब उसके दोस्त रोहन से एक छोटी सी गलती हुई, तो अर्जुन ने सबके सामने उसका मज़ाक उड़ाया। रोहन बहुत शर्मिंदा हुआ और चुपचाप वहाँ से चला गया।
उस शाम, अर्जुन ने अपने दादाजी को एक लकड़ी की कठपुतली के साथ खेलते देखा। वह कठपुतली धागों से बंधी हुई थी। दादाजी जैसे ही धागा खींचते, कठपुतली नाचने लगती। अर्जुन ने कहा, "दादाजी, यह कठपुतली कितनी सुंदर नाचती है! लेकिन यह खुद से नहीं नाच सकती, है ना? यह तो बस धागों के इशारों पर चलती है।"
दादाजी ने प्यार से अर्जुन की ओर देखा और कहा, "बिल्कुल सही कहा अर्जुन। इस कठपुतली में अपनी कोई जान नहीं है, इसलिए ये धागे ही इसकी जान हैं। लेकिन एक इंसान के पास 'लज्जा' या 'संकोच' रूपी शक्ति होती है। जब कोई व्यक्ति गलत काम करते समय या दूसरों का अपमान करते समय शर्म महसूस नहीं करता, तो वह इस कठपुतली जैसा ही हो जाता है। जैसे धागा खींचने वाला कठपुतली को नचाता है, वैसे ही लज्जाहीन व्यक्ति केवल दूसरों के बहकावे में आकर काम करता है। उसके पास अपना कोई विवेक नहीं रहता।"
अर्जुन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसे समझ आया कि बिना शर्म और नैतिकता के, वह भी दूसरों के व्यवहार के इशारों पर नाचने वाली एक कठपुतली के समान है। अगले दिन, उसने रोहन से माफी मांगी और एक बेहतर इंसान बनने का संकल्प लिया।