एक छोटे से गाँव में रामू नाम का एक किसान रहता था। उसके हाथ हमेशा मिट्टी से सने रहते थे, लेकिन उसके चेहरे पर हमेशा संतोष रहता था। रामू का बेटा, आर्यन, शहर में जाकर बड़ा आदमी बनना चाहता था। एक दिन आर्यन ने पूछा, 'पिताजी, आप रोज़ इतनी धूप में इतनी मेहनत क्यों करते हैं? क्या हम सब कुछ छोड़कर शांति से नहीं रह सकते?'
रामू मुस्कुराया और बोला, 'बेटा, हम जो भी खाते हैं, वह इस मिट्टी की मेहनत का फल है। अगर किसान ने हल चलाना छोड़ दिया, तो हम सिर्फ सपने देख पाएंगे, पेट नहीं भर पाएंगे।'
कुछ समय बाद, गाँव में भीषण सूखा पड़ा। रामू का एक पड़ोसी, सोमेश, निराश होकर बोला, 'इतनी मेहनत का क्या फायदा? मैं सब कुछ छोड़कर जंगल में तपस्या करने जा रहा हूँ।' सोमेश जंगल में तपस्या करने बैठा, लेकिन भूख के कारण उसका शरीर साथ नहीं दे रहा था। उसे ध्यान लगाने में भी कठिनाई होने लगी। तब सोमेश को समझ आया कि बिना किसान के अन्न के, तपस्या और शांति भी संभव नहीं है। आर्यन ने भी अपने पिता के पसीने की कीमत समझ ली और खेत में हाथ बँटाने पहुँच गया।