एक समय की बात है, सोमनाथ नाम का एक बहुत धनी व्यक्ति रहता था। वह एक बहुत प्रतिष्ठित परिवार से था और हमेशा दूसरों को नीचा समझता था। उसका बेटा, कविन, बहुत ही दयालु और विनम्र था। लेकिन एक समय ऐसा आया जब सोमनाथ के व्यापार में भारी नुकसान हुआ। जिस घर में कभी वैभव था, वह धीरे-धीरे गरीबी की चपेट में आ गया।
जैसे-जैसे धन कम हुआ, सोमनाथ का व्यवहार भी बदलने लगा। गरीबी ने उसे चिड़चिड़ा बना दिया था। वह अपने पड़ोसियों और उन लोगों से, जिन्होंने कभी उसकी सेवा की थी, बहुत ही अपमानजनक भाषा में बात करने लगा। 'तुम्हारी इतनी हिम्मत कि मुझसे ऐसे बात करो!' वह अक्सर चिल्लाता था। उसके शब्द बहुत कड़वे और नीच थे।
कविन को अपने पिता का यह रूप देखकर बहुत दुख हुआ। एक दिन उसने सोमनाथ से कहा, 'पिताजी, हमारे पास धन नहीं है, लेकिन हमारे पास सम्मान होना चाहिए। गरीबी हमारे धन को छीन सकती है, लेकिन हमारे चरित्र को नहीं।'
सोमनाथ को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसे समझ आया कि भले ही वह एक ऊँचे कुल में पैदा हुआ था, लेकिन संकट के समय उसके द्वारा बोले गए अपशब्द उसके परिवार की प्रतिष्ठा को नष्ट कर रहे थे। उस दिन के बाद, उसने अपने शब्दों पर नियंत्रण रखना सीख लिया।