एक छोटे से गाँव में कन्नन नाम का एक लड़का रहता था। उसका परिवार बहुत गरीब था। एक दिन उसकी माँ बीमार हो गई और घर में खाने के लिए कुछ नहीं था। भूख से व्याकुल होकर कन्नन पड़ोस में थोड़ा चावल माँगने गया। लेकिन पड़ोसी ने कहा, 'अभी मेरे पास नहीं है, बाद में आना।' यह सुनकर कन्नन को बहुत गुस्सा आया। वह चिल्लाने लगा, 'आप हमेशा ऐसा ही क्यों करते हैं? क्या आपको नहीं दिखता कि हम भूखे हैं?'
पास ही बैठे एक बुजुर्ग ने कन्नन को रोका। उन्होंने प्यार से कहा, 'बेटा, सुनो। तुम मदद माँगने गए हो। अगर कोई मदद नहीं कर पाता, तो गुस्सा करने से तुम्हारा पेट नहीं भरेगा। तुम्हारी गरीबी पहले से ही एक बड़ी समस्या है, गुस्से से तुम अपनी गरिमा भी खो दोगे। शांत रहकर किसी और से मदद माँगो।'
कन्नन को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने समझा कि गुस्सा करने से भूख नहीं मिटेगी, बल्कि दूसरों की नज़रों में उसका सम्मान कम होगा। वह चुपचाप वहाँ से चला गया। कुछ ही देर में, एक दयालु महिला ने उसे भोजन दिया। कन्नन ने उस दिन जीवन का एक बड़ा सबक सीखा।