एक छोटे से गाँव में करी नाम का एक युवक अपनी बूढ़ी माँ के साथ रहता था। एक साल भयंकर सूखा पड़ा, जिससे उनके पास खाने के लिए कुछ न बचा। करी बहुत परेशान था। उसके दोस्त सोमू ने कहा, 'तुम इतना क्यों सोच रहे हो? शहर जाओ और हाथ फैलाकर भीख मांग लो, खाना आसानी से मिल जाएगा। मेहनत करने में तो बहुत समय लगेगा।'
करी एक पल के लिए ठिठक गया। अपनी माँ को भूख से बेहाल देखकर उसका मन डगमगाया, पर फिर उसने सोचा, 'भीख मांगकर शायद पेट भर लूँ, लेकिन मैं अपना और अपनी माँ का सम्मान खो दूँगा। मेहनत करना ही सही रास्ता है।' वह पास के एक बड़े खेत में काम करने चला गया। उसने कड़ी धूप में मिट्टी खोदी और पौधों की देखभाल की। उसकी मेहनत देखकर खेत के मालिक ने उसे रोज़ मज़दूरी देना शुरू कर दिया।
कुछ ही हफ्तों में, करी ने अपनी मेहनत की कमाई से अपनी माँ के लिए भोजन जुटा लिया। उसने समझ लिया कि गरीबी से बचने के लिए भीख मांगना सबसे बड़ी मूर्खता है। असली सम्मान पसीने की कमाई में ही है।