एक सुंदर से गाँव में कन्नन नाम का एक लड़का अपने माता-पिता के साथ रहता था। कन्नन बहुत मेहनती था, लेकिन एक साल भीषण सूखा पड़ा और गाँव की सारी फसलें सूख गईं। कन्नन का परिवार बहुत मुश्किल में आ गया और घर में खाने के लाले पड़ गए।
कन्नन के दोस्त रवि ने सुझाव दिया, 'कन्नन, क्यों न हम पड़ोसियों से थोड़ा खाना माँग लें? वे हमें ज़रूर देंगे।'
कन्नन एक पल के लिए रुक गया। भूख के मारे उसका पेट दर्द कर रहा था, लेकिन उसे अपने पिता की सिखाई बात याद आई: 'मेहनत से कमाया हुआ एक दाना भी, किसी की दया पर मिलने वाले पकवानों से कहीं बेहतर है।'
कन्नन ने दृढ़ता से कहा, 'नहीं रवि, चाहे कितनी भी मुश्किल आए, हमें काम करके ही अपनी ज़रूरतें पूरी करनी चाहिए। हमें किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना चाहिए।'
अगली सुबह, कन्नन जंगल गया और सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा कीं। उसने उन्हें बाज़ार में बेचा और उससे मिले पैसों से अपने परिवार के लिए थोड़ा भोजन खरीदा। कठिन समय में भी अपने स्वाभिमान को न खोने वाले कन्नन के इस गुण की पूरे गाँव ने प्रशंसा की।