एक छोटे से गाँव में कन्नन नाम का एक लड़का रहता था। उसके पिता के व्यापार में नुकसान होने के कारण घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी। कन्नन को स्कूल के लिए एक नई किताब खरीदनी थी, लेकिन उसके पास पैसे नहीं थे। उसने सबसे पहले अपने पड़ोसी, एक अमीर व्यक्ति माणिक से मदद मांगी। माणिक के पास धन तो बहुत था, लेकिन उसका दिल बहुत छोटा था। जब कन्नन ने मदद मांगी, तो माणिक ने चिढ़ते हुए कहा, 'मेरे पास फालतू समय नहीं है, जाओ यहाँ से!'
कन्नन को बहुत बुरा लगा और वह शर्मिंदा होकर वहाँ से चला गया। उसके दादाजी ने उसे उदास देखा और पास बुलाकर समझाया, 'बेटा, मदद माँगना बुरा नहीं है, लेकिन कभी भी उन लोगों से मदद मत मांगना जो उसे अनिच्छा से देते हों। अगर वे मदद कर भी दें, तो भी वह तुम्हारी आत्मा को ठेस पहुँचाएगी। अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए या तो मेहनत करो या फिर उन्हीं से मांगो जो खुशी से देते हों।'
कन्नन को दादाजी की बात समझ आ गई। उसने फिर कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। उसने छोटे-मोटे काम करके पैसे जमा किए और अपनी किताब खुद खरीदी। अपनी मेहनत से मिली सफलता ने उसे जो खुशी दी, वह किसी दान से नहीं मिल सकती थी।