पहाड़ियों की तलहटी में बसे एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। अर्जुन बुद्धिमान था, लेकिन उसे अपनी सुख-सुविधाओं पर थोड़ा घमंड था। एक शाम, जब वह अपनी नई साइकिल चला रहा था, उसने सड़क के किनारे एक बूढ़े व्यक्ति को देखा। वह व्यक्ति बहुत कमजोर लग रहा था और भूख से व्याकुल था।
उस वृद्ध ने कांपती आवाज़ में पूछा, "बेटा, क्या मुझे थोड़ा भोजन मिल सकता है?"
अर्जुन को चिढ़ हुई और उसने झिड़कते हुए कहा, "नहीं! यहाँ कुछ नहीं है, जाओ यहाँ से!" और वह साइकिल चलाकर आगे निकल गया।
उस रात अर्जुन को नींद नहीं आई। उसे बार-बार उस बूढ़े व्यक्ति का उदास चेहरा दिखाई दे रहा था। उसे एहसास हुआ कि उसके उस एक शब्द 'नहीं' ने न केवल उस व्यक्ति की उम्मीद तोड़ी, बल्कि उसकी आत्मा को भी चोट पहुँचाई। उसने महसूस किया कि किसी की मदद करने से इनकार करना हमारे अपने मन की शांति को भी छीन लेता है। अगली सुबह, अर्जुन दौड़कर उस वृद्ध के पास गया, उनसे माफी मांगी और अपना भोजन उनके साथ साझा किया। तभी जाकर उसके मन को सुकून मिला।