एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक युवक रहता था। वह बहुत ही ईमानदार और हर काम को पूरी निपुणता से करने वाला व्यक्ति था। गाँव के मेले के लिए उसने लकड़ी के खिलौने बनाने का फैसला किया। अर्जुन हर खिलौने को इतनी बारीकी से तराशता कि उसमें कोई कमी न रहे। वह अक्सर रात भर जागता और सोचता, 'कहीं इसमें कोई नुकीला कोना तो नहीं रह गया? कहीं बच्चा चोटिल तो नहीं हो जाएगा?' इस जिम्मेदारी के अहसास ने उसे बेचैन रखा।
उसी गाँव में रवि नाम का एक व्यक्ति था। रवि को काम की समझ तो कम थी, लेकिन वह बहुत ही लापरवाह और खुशमिजाज था। वह बस लकड़ी के टुकड़ों पर रंग लगा देता और उन्हें 'शानदार खिलौना' कहकर बेचने लगता। रवि को किसी बात की चिंता नहीं थी। वह दिन भर हँसता और रात को चैन से सोता। वह सोचता, 'दिखने में तो ठीक है, फिर फिक्र किस बात की?'
कुछ ही दिनों में रवि के खिलौने टूटकर बिखर गए, और लोग उसे धोखा देने लगे। रवि की हँसी तो बनी रही, पर उसका सम्मान चला गया। दूसरी ओर, अर्जुन भले ही अपनी गलतियों को लेकर चिंतित रहता था, लेकिन उसके बनाए खिलौने सालों-साल चलते थे। गाँव के लोगों ने अर्जुन की ईमानदारी की बहुत सराहना की। अर्जुन की वह 'बेचैनी' दरअसल उसकी महानता की नींव थी, जबकि रवि की खुशी केवल अज्ञानता का परिणाम थी।