एक छोटे से गाँव में करी नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत होनहार था, लेकिन उसमें एक कमी थी—लालच। एक दिन, अपने दादाजी अर्जुन की पुरानी संदूक साफ करते समय, करी को एक सोने का सिक्का मिला। बिना सोचे-समझे, करी ने उस सिक्के को अपनी जेब में छिपा लिया।
उस रात करी को नींद नहीं आई। उसके मन में बस एक ही डर था, 'अगर दादाजी को पता चल गया तो? अगर किसी ने देख लिया तो?' डर के मारे उसका बुरा हाल था। अगले दिन जब उसने दादाजी को अपनी खोई हुई चीज़ों के लिए परेशान देखा, तो उसका दिल भर आया। उसे एहसास हुआ कि उस सिक्के की खुशी से कहीं ज़्यादा बड़ा वह डर और पछतावा था जो उसे अंदर ही अंदर खा रहा था।
अंत में, करी रोते हुए दादाजी के पास गया और सिक्का वापस कर दिया। उसने कहा, 'दादाजी, मैंने यह लिया था, मुझे माफ कर दीजिए।' दादाजी ने उसे डांटने के बजाय गले लगा लिया और कहा, 'बेटा, तुमने सच बोल दिया, यही सबसे बड़ी बात है।' करी ने सीखा कि लालच इंसान को गलत रास्ते पर ले जाता है और उस गलती का डर इंसान की शांति छीन लेता है।