एक छोटे से गाँव में दो पड़ोसी रहते थे, राम और श्याम। राम बहुत ही दयालु था, जबकि श्याम बहुत ही कंजूस और स्वार्थी था। एक बार गाँव में भीषण सूखा पड़ा। फसलें सूख गईं और लोग खाने के लिए तरसने लगे।
राम के पास थोड़ा अनाज जमा था। जब एक बूढ़ी महिला भूख से व्याकुल होकर उसके पास आई और मदद मांगी, तो राम ने बिना एक पल सोचे अपना भोजन उसके साथ साझा कर लिया। राम की इस उदारता ने गाँव वालों को हिम्मत दी।
दूसरी ओर, श्याम ने अपने अनाज के भंडार को ताला लगाकर बंद कर दिया था। जब लोग मदद के लिए आए, तो वह चिल्लाकर कहता, 'यह मेरी मेहनत की कमाई है, मैं क्यों दूँ?' धीरे-धीरे भूख बढ़ने लगी और गाँव वाले श्याम के दरवाजे पर इकट्ठा हो गए। काफी शोर-शराबे और दबाव डालने के बाद, श्याम ने अपना अनाज निकाला। वह बिल्कुल गन्ने की तरह था—जैसे गन्ने का रस निकालने के लिए उसे कुचलना पड़ता है, वैसे ही श्याम को बहुत परेशान करने के बाद ही उसने मदद की। राम ने मदद की बात सुनते ही दान कर दिया, लेकिन श्याम ने तभी दिया जब उसे मजबूर किया गया। अंत में, राम का सम्मान हुआ और श्याम को अपने स्वार्थ पर पछतावा हुआ।