पहाड़ों की तलहटी में बसे एक छोटे से गाँव में आर्यन और मीरा रहते थे। आर्यन एक कुशल मूर्तिकार था और मीरा बहुत ही सरल और कोमल स्वभाव की थी। एक बार आर्यन को एक बहुत बड़े मंदिर में काम करने के लिए बुलाया गया। वह मंदिर इतना भव्य था कि उसके सुनहरे शिखर और सुंदर बगीचे देखकर आर्यन दंग रह गया। उसने सोचा, 'इतना सुंदर और दिव्य स्थान देखकर लगता है जैसे यह स्वर्ग ही हो। फिर हम अपने छोटे से घर में इतने खुश कैसे रहते हैं?'
जब काम पूरा हुआ, तो आर्यन अपने घर लौटा। एक शाम, मीरा पेड़ की छाँव में उसका इंतज़ार कर रही थी। थका हुआ आर्यन उसके पास आकर बैठ गया। मीरा ने अपना सिर आर्यन के कंधे पर रख दिया और वे दोनों शांति से उस पल का आनंद लेने लगे। उस सुकून भरे पल में आर्यन को महसूस हुआ कि भगवान विष्णु का स्वर्ग चाहे कितना भी सुंदर क्यों न हो, लेकिन अपनी प्रियतमा की गोद में सिर रखकर सोने में जो सुख और मिठास है, वह कहीं और नहीं मिल सकती। उसे समझ आ गया कि स्वर्ग कोई जगह नहीं, बल्कि अपनों का साथ है।