एक सुंदर से गाँव में माया और उसका पति अर्जुन रहते थे। एक दिन माया के मन में एक छोटी सी बात को लेकर बहुत दुख हुआ। वह अपनी एक सहेली से हुई अनबन की वजह से परेशान थी। माया ने सोचा कि अगर वह इस दुख को किसी को नहीं बताएगी, तो यह अपने आप ठीक हो जाएगा। उसने अपने दर्द को छिपाने का फैसला किया।
लेकिन माया ने जितना दर्द छिपाने की कोशिश की, वह उतना ही बढ़ता गया। वह चुपचाप रहने लगी और उसकी मुस्कान गायब हो गई। अर्जुन ने माया की उदासी को महसूस किया। एक शाम उसने माया का हाथ थामकर प्यार से पूछा, 'माया, क्या बात है? तुम इतनी परेशान क्यों हो?' माया ने पहले तो मना कर दिया, पर अर्जुन ने कहा, 'अगर तुम अपना दुख बाँटोगी, तो वह कम होगा, और अगर छिपाओगी, तो वह बढ़ता जाएगा।'
अंत में, माया ने अपना सारा दुख अर्जुन को बता दिया। जैसे ही उसने अपने मन की बात कही, उसे ऐसा लगा जैसे उसके सीने से कोई भारी पत्थर हट गया हो। जैसे एक झरने से पानी बहता रहता है तो वह कभी खाली नहीं होता, वैसे ही दुख बाँटने से मन हल्का हो गया। जिसे उसने छिपाना चाहा, वह बढ़ गया, लेकिन जिसे बाँट दिया, वह मिट गया।