एक सुंदर पहाड़ी गाँव में धारा नाम की एक महिला रहती थी। वह बहुत ही सुशील और दयालु थी। गाँव के सभी लोग उसकी प्रशंसा करते थे और कहते थे, 'धारा कितनी अच्छी स्त्री है!' उसकी मुस्कान और दूसरों की मदद करने का स्वभाव उसे सबका प्रिय बनाता था।
लेकिन धारा के मन में एक गहरा खालीपन था। उसका पति, कबीर, व्यापार के सिलसिले में बहुत दूर चला गया था। उसके जाने के बाद, धारा खुद को बहुत अकेला महसूस करती थी। गाँव के लोग चाहे उसकी कितनी भी तारीफ क्यों न करें, कबीर के प्यार और साथ के बिना उसे सब कुछ व्यर्थ लगता था।
एक दिन गाँव के एक बुजुर्ग ने उससे पूछा, 'धारा, तुम इतनी उदास क्यों रहती हो? देखो, पूरा गाँव तुम्हारा कितना सम्मान करता है!' धारा ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, 'बाबा, दुनिया की प्रशंसा मेरे दिल के खालीपन को नहीं भर सकती। मेरे पति का प्रेम ही मेरे जीवन का प्रकाश है। यदि वह प्रकाश ही नहीं है, तो दुनिया की सारी प्रशंसा मेरे लिए अंधेरे के समान है।' धारा की बातों ने यह सिखाया कि असली खुशी बाहरी प्रशंसा में नहीं, बल्कि अपनों के प्रेम में होती है।