एक शांत गाँव में माया नाम की एक स्त्री रहती थी। उसका पति अर्जुन काम के सिलसिले में दूसरे शहर में रहता था। माया उसे बहुत याद करती थी। एक दिन उसकी सहेली सारा उससे मिलने आई। सारा बहुत ही खुशमिजाज लड़की थी और उसे किसी की कमी महसूस नहीं होती थी।
माया को उदास देखकर सारा ने पूछा, "माया, तुम इतनी दुखी क्यों हो? क्या अर्जुन अभी तक नहीं आया? तुम पूरे दिन अकेले कैसे रह लेती हो?"
माया ने धीमे से कहा, "भले ही वह दिन में मेरे पास न हो, लेकिन वह हर रात मेरे सपनों में आता है। सपनों में उसका चेहरा देखकर मेरे मन को शांति मिलती है।"
सारा हंसते हुए बोली, "अरे, यह तो बस सपना है! सपनों से क्या होता है? असली बात तो यह है कि वह सच में आकर तुम्हारे साथ रहे।"
माया ने सारा की आँखों में देखते हुए कहा, "सारा, तुम खुश इसलिए हो क्योंकि तुम्हारे जीवन में कोई ऐसा नहीं है जिसके लिए तुम इतनी तड़पो कि उसे अपने सपनों में भी ढूँढो। क्योंकि तुम अपने सपनों में किसी प्रियजन को नहीं पाती हो, इसीलिए तुम यह नहीं समझ पातीं कि दिन के उजाले में किसी के न आने पर दूसरों को कितनी पीड़ा होती है।"
सारा चुप हो गई। उसे समझ आया कि क्योंकि उसके अपने सपनों में कोई इंतज़ार करने वाला नहीं था, इसलिए वह दूसरों के विरह के दर्द को नहीं समझ पा रही थी।