एक सुंदर से गाँव में इलवेनिल नाम की एक महिला रहती थी। वह अपने पति कथिर से बहुत प्रेम करती थी। कथिर व्यापार के सिलसिले में कुछ समय के लिए दूर शहर गया हुआ था।
इलवेनिल हर दिन घर के दरवाज़े पर बैठकर उस रास्ते को निहारती रहती जहाँ से कथिर आता था। उसकी आँखें उसे देखने के लिए व्याकुल थीं। उसे हर पल कथिर की मुस्कुराहट और उसकी बातें याद आती थीं। उसे ऐसा महसूस होता था जैसे उसकी आँखें उसे देख पाने की इच्छा में अंदर ही अंदर खा रही हों।
एक शाम, अपनी बेचैनी से परेशान होकर उसने अपने मन से कहा, 'हे मेरे प्राण! यदि तुम मेरे साथ हो, तो मेरी आँखों को भी अपने साथ ले जाओ। क्योंकि उसे देखने की तीव्र इच्छा में ये आँखें मुझे ही खा रही हैं।'
उसकी यह तड़प केवल अकेलापन नहीं थी, बल्कि उसके गहरे प्रेम की पराकाष्ठा थी। जब अंततः कथिर घर लौटा, तो उसे देखते ही उसकी आँखों की सारी तड़प खुशी के आँसुओं में बदल गई।