एक सुंदर गाँव में मीरा नाम की एक युवती रहती थी। मीरा के चेहरे पर हमेशा एक अनोखी चमक रहती थी। उसका पति, आर्यन, काम के सिलसिले में शहर गया हुआ था। मीरा का मन हर पल आर्यन की यादों में ही बसा रहता था।
एक दिन उसकी सहेली राधा ने कहा, 'मीरा, तुम हर समय आर्यन के बारे में ही क्यों सोचती रहती हो? उसे भूलकर अपने काम पर ध्यान दो, वरना तुम उदास रहने लगोगी।'
मीरा ने धीरे से मुस्कुराते हुए जवाब दिया, 'राधा, उसकी यादें मुझे उदास नहीं करतीं, बल्कि मुझे जीवन जीने की शक्ति देती हैं। अगर मैं उसे भूल जाऊँ, तो मेरे हाथों के कंगन भी अपनी चमक खो देंगे। मेरा प्रेम ही मेरी असली सुंदरता है।'
मीरा की बात सच थी। उसका प्रेम उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुका था। जब आर्यन वापस आया, तो उसने मीरा को पहले से भी अधिक सुंदर पाया। वह सुंदरता उसके गहनों की नहीं, बल्कि उसके हृदय में बसी उस अटूट प्रेम की थी जिसे उसने कभी कम नहीं होने दिया।