एक छोटे से गाँव में इलवेनिल और कथिर् नाम का एक जोड़ा रहता था। इलवेनिल बहुत ही शांत स्वभाव की थी और अपनी परेशानियों को अपने तक ही सीमित रखना पसंद करती थी। एक शाम, जब कथिर् काम से घर लौटा, तो उसने देखा कि इलवेनिल खिड़की के पास बैठी शून्य में ताक रही है। उसके चेहरे पर एक अजीब सी उदासी थी।
'इलवेनिल, क्या हुआ? क्या सब ठीक है?' कथिर् ने प्यार से पूछा। इलवेनिल ने एक बनावटी मुस्कान के साथ कहा, 'कुछ नहीं कथिर्, मैं बिल्कुल ठीक हूँ।' उसने ऐसा दिखाने की कोशिश की जैसे उसे कोई चिंता न हो, लेकिन उसकी आँखें कुछ और ही कह रही थीं। उसकी आँखें नम थीं और उनमें एक गहरा दर्द छिपा था।
कथिर् उसकी बातों पर नहीं, बल्कि उसकी आँखों पर भरोसा करता था। उसने देखा कि इलवेनिल की आँखें उसकी उदासी की गवाही दे रही थीं। कथिर् ने उसके पास बैठकर उसका हाथ थामा और धीरे से कहा, 'तुम्हारी जुबान भले ही झूठ बोल दे, लेकिन तुम्हारी आँखें सच बोल रही हैं।'
कथिर् की बात सुनकर इलवेनिल का बांध टूट गया और उसने अपने मन का सारा बोझ उसके सामने हल्का कर दिया। कथिर् ने उसे सहारा दिया और उसकी बातें सुनीं। उस दिन उन्होंने सीखा कि हम चाहे अपने चेहरे या शब्दों से कितने भी भावों को छिपाने की कोशिश करें, हमारी आँखें हमेशा हमारे दिल का सच बयां कर देती हैं।