एक छोटे से गाँव में माया नाम की एक महिला रहती थी। वह बहुत ही शालीन और सुंदर थी। उसका पति, अर्जुन, एक कवि था जो छोटी-छोटी चीजों में सुंदरता ढूँढ लेता था। एक शाम, जब माया उत्सव के लिए तैयार हो रही थी, अर्जुन उसे देख रहा था। माया ने मोतियों का एक बहुत सुंदर हार पहना था।
अर्जुन ने कहा, 'माया, तुम्हारा यह हार बहुत चमक रहा है। लेकिन क्या तुमने सोचा है कि इसे इतना सुंदर क्या बनाता है?' माया ने मुस्कुराते हुए पूछा, 'क्या इसके मोती?' अर्जुन ने सिर हिलाया और कहा, 'नहीं, वह अदृश्य धागा जो इन मोतियों को एक साथ पिरोए हुए है। वह धागा दिखता नहीं है, लेकिन अगर वह न हो, तो ये मोती बिखर जाएँगे। ठीक वैसे ही, तुम्हारी सुंदरता और तुम्हारे गहने मोती हैं, लेकिन तुम्हारा स्वभाव, तुम्हारी दया और तुम्हारा प्रेम वह धागा है जो तुम्हें पूर्ण बनाता है।'
माया को बात समझ आ गई। उसे एहसास हुआ कि उसकी असली चमक उसके गहनों में नहीं, बल्कि उसके अच्छे व्यवहार और प्रेम में है, जो उसे एक संपूर्ण व्यक्तित्व देता है।