पहाड़ों की तलहटी में बसे एक छोटे से गाँव में मलर रहती थी। वह अपने पति कत़िर से बहुत प्रेम करती थी। एक बार, काम के सिलसिले में कत़िर को कुछ दिनों के लिए शहर जाना पड़ा। मलर दिन भर अपने घर के कामों में व्यस्त रहती और पड़ोसियों से बातें करती, जिससे लगता था कि वह बिल्कुल ठीक है।
लेकिन शाम होते ही सब बदल जाता। एक शाम, जब सूरज ढल रहा था, मलर अपने घर के बरामदे में अकेली बैठी थी। उस सन्नाटे में, उसका मन कत़िर की यादों में खो गया। उसकी मुस्कुराहट, उसकी बातें—सब कुछ उसकी आँखों के सामने तैरने लगा। उस एकांत में, कत़िर की यादें उसे इस कदर सताने लगीं कि उसे महसूस हुआ जैसे उसका हृदय उन यादों के कारण खुद को ही खा रहा हो। दुनिया के सामने वह मुस्कुराती थी, पर अकेले में उसका प्रेम एक मीठे दर्द में बदल जाता था। उस तन्हाई ने उसे अहसास कराया कि उसका प्रेम कितना गहरा है।