एक शांत गाँव में अर्जुन और मीरा रहते थे। अर्जुन बहुत ही दयालु स्वभाव का था, लेकिन कभी-कभी उसके शब्द उसकी भावनाओं की गहराई को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाते थे। एक शाम, झील के किनारे बैठे हुए, अर्जुन ने मीरा की आँखों में देखते हुए कहा, "मीरा, तुम इस दुनिया की किसी भी अन्य स्त्री से कहीं अधिक प्रिय हो।"
मीरा का दिल एक पल के लिए थम गया, लेकिन उसे एक हल्की सी चुभन महसूस हुई। जब उसने कहा 'किसी अन्य से अधिक', तो मीरा को लगा कि वह उसकी तुलना दूसरों से कर रहा है, बजाय इसके कि उसे अद्वितीय माने। उसने मुँह फुला लिया और तीखे स्वर में कहा, "दूसरों से अधिक? हाँ, बिल्कुल, दूसरों से अधिक!" और वह वहाँ से चली गई।
अर्जुन हैरान रह गया। वह तो उसकी प्रशंसा करना चाहता था, लेकिन मीरा ने इसे एक तुलना के रूप में ले लिया। मीरा अपने घर में खिड़की के पास बैठी चाँद को देख रही थी। उसका गुस्सा नफरत नहीं था, बल्कि यह उसकी चाहत थी कि उसे सबसे अलग समझा जाए। थोड़ी देर बाद अर्जुन उसके पास आया और धीरे से बोला, "मीरा, मेरा मतलब तुम्हारी तुलना करना नहीं था। मेरा मतलब था कि मेरी दुनिया में तुम्हारे सिवा कोई और है ही नहीं।"
अर्जुन की सच्चाई समझकर मीरा के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्होंने सीखा कि सच्चे प्रेम में तुलना की आवश्यकता नहीं होती, केवल समर्पण ही काफी है।