एक विशाल जंगल में एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था। उस पेड़ पर कई रंग-बिरंगे पक्षी अपने सुंदर घोंसले बनाकर रहते थे। वे पक्षी बहुत मेहनती थे और उन्होंने बारिश के मौसम से पहले ही अपने घोंसलों को सूखी घास और टहनियों से बहुत मज़बूती से बना लिया था।
एक दिन अचानक आसमान में काले बादल छा गए और ज़ोरदार बारिश होने लगी। सभी पक्षी अपने सुरक्षित घोंसलों के अंदर दुबक गए और बारिश से बच गए। वहीं दूसरी ओर, बंदरों का एक झुंड जो बारिश के लिए तैयार नहीं था, पेड़ के नीचे ठंड से कांपते हुए खड़ा था।
पेड़ की एक ऊँची डाल पर बैठे एक बूढ़े कबूतर ने बंदरों से कहा, "मित्रों, यदि आपने भी हमारी तरह अपने लिए छोटे घर बना लिए होते, तो आज आपको इस बारिश में नहीं भीगना पड़ता।"
यह सुनकर एक शरारती बंदर गुस्से में बोला, "ये नन्हे पक्षी हमें सिखाएंगे!"
दूसरे बंदर ने चिढ़ाते हुए कहा, "बारिश रुकने दो, फिर इन छोटे पक्षियों को हम अपनी ताकत दिखाएंगे।"
जैसे ही बारिश रुकी, बंदरों का झुंड गुस्से में पेड़ पर चढ़ गया। उन्होंने पक्षियों के सुंदर घोंसलों को नोच-नोचकर नीचे गिरा दिया। पक्षी बहुत दुखी और परेशान हो गए।
तब उस बूढ़े कबूतर ने शांति से कहा, "पक्षियों, दुखी मत हो। हमें यह समझना चाहिए कि सलाह केवल उन्हीं को देनी चाहिए जो उसे सुनने और समझने की समझ रखते हों। जो लोग अहंकार में डूबे हों, उन्हें ज्ञान देना व्यर्थ है। आज इन बंदरों ने अपनी मूर्खता का परिचय दे दिया है।"
पक्षियों ने इस बात को गहराई से समझा और आगे से सावधानी बरतने का निर्णय लिया।
Moral
सलाह केवल उन्हीं को दें जो उसे सुनने का धैर्य और समझ रखते हों।