एक बहुत बड़े जंगल में बंदरों का एक झुंड रहता था। एक रात जंगल में बहुत तेज़ ठंड पड़ रही थी। ठंड के मारे सभी बंदर थर-थर कांप रहे थे।
"उफ़! यह ठंड तो बर्दाश्त के बाहर है! काश! हमें कहीं आग मिल जाती!" एक बूढ़े बंदर ने ठिठुरते हुए कहा। सभी बंदर गर्मी की तलाश में इधर-उधर भागने लगे।
तभी, अंधेरे में एक छोटा सा जुगनू चमकता हुआ उनकी ओर उड़कर आया। उसकी सुनहरी रोशनी देखकर बंदरों को लगा कि वह आग की एक चिंगारी है। "देखो! देखो! आग आ रही है!" एक युवा बंदर उत्साह से चिल्लाया।
बंदरों ने उस रोशनी को पकड़ने की कोशिश शुरू कर दी। "जल्दी करो! इसे बुझने मत देना! इसे लकड़ियों के नीचे दबा दो, ताकि यह बड़ी आग बन जाए!" एक बंदर ने निर्देश दिया। सभी बंदर उस जुगनू के पीछे भागे और उसे छोटी टहनियों के नीचे दबाने लगे, इस उम्मीद में कि वह आग की तरह फैल जाएगा।
लेकिन वे जितनी कोशिश करते, रोशनी उतनी ही कम होती जाती। वह जुगनू डर के मारे कांपने लगा। तभी एक समझदार उल्लू पेड़ से नीचे उतरा और बोला, "रुको! यह क्या पागलपन कर रहे हो?"
बंदरों ने हैरानी से पूछा, "क्यों? यह आग बड़ी क्यों नहीं हो रही है?"
उल्लू ने हंसते हुए कहा, "क्योंकि यह आग नहीं, एक छोटा सा जुगनू है! तुम एक नन्हे जीव को आग समझकर उसे परेशान कर रहे हो। तुम एक जुगनू से गर्मी नहीं पा सकते।" बंदरों को अपनी मूर्खता का अहसास हुआ। उन्हें बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई और उन्होंने उस नन्हे जुगनू को शांति से उड़ जाने दिया।
Moral
बिना सोचे-समझे और बिना सच्चाई जाने किया गया काम हमेशा व्यर्थ होता है।