एक घने जंगल में एक बहुत पुराना और विशाल बरगद का पेड़ था। उस पेड़ के एक खोखले हिस्से में एक बुद्धिमान उल्लू रहता था। एक सुनहरी दोपहर, उल्लू अपने घर में शांति से सो रहा था।
तभी, एक टिड्डा वहां आया और 'किक-किक' की तेज़ आवाज़ करते हुए कूदने लगा। उस शोर से उल्लू की नींद टूट गई। उल्लू ने धीरे से आँखें खोलीं और कहा, "प्रिय मित्र, मुझे थोड़ा आराम करने दें। क्या आप कृपया शांति से रह सकते हैं?"
टिड्डे को बहुत गुस्सा आया। उसने घमंड से कहा, "क्या यह पेड़ सिर्फ तुम्हारा है? मैं जहाँ चाहूँ, वहाँ शोर मचा सकता हूँ!"
उल्लू ने बहस करने के बजाय एक चतुर योजना बनाई। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे वाह! आपकी आवाज़ तो बहुत ही मधुर है। आप जो गा रहे हैं, वह किसी संगीत से कम नहीं है!"
अपनी प्रशंसा सुनकर टिड्डा फूल गया। उसने पूछा, "क्या सच में?" उल्लू ने उत्तर दिया, "हाँ, आपकी मधुर आवाज़ सुनने के लिए मैं सारा दिन यहीं बैठा रहूँगा।"
प्रशंसा के जाल में फँसकर, टिड्डा वहीं रुक गया और पूरे दिन ज़ोर-ज़ोर से गाता रहा। जैसे ही सूरज ढला और अंधेरा हुआ, टिड्डे को कुछ दिखाई देना बंद हो गया। वह अंधेरे में लड़खड़ाने लगा।
लेकिन उल्लू तो रात का राजा था। उसकी तेज़ आँखों ने अंधेरे में भी सब कुछ साफ़ देख लिया। उल्लू ने फुर्ती से टिड्डे पर हमला कर दिया।
टिड्डे को तब समझ आया कि उल्लू ने उसकी तारीफ केवल उसे रात होने तक वहीं रोके रखने के लिए की थी। झूठी प्रशंसा एक जाल थी।
Moral
झूठी प्रशंसा से सावधान रहें; यह आपको खतरे में डाल सकती है।