पहाड़ियों के बीच बसे एक छोटे से गाँव में सभी लोग बहुत सुखी और संतुष्ट थे। वहाँ कोई भी भूखा नहीं सोता था और सब मिल-जुलकर रहते थे। एक दिन, एक वृद्ध यात्री उस गाँव के रास्ते से गुजर रहे थे।
चलते-चलते उन्हें रास्ते में एक चमकता हुआ सोने का सिक्का मिला। वह यात्री एक साधु थे, उन्हें धन की कोई आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने सोचा, "यह सिक्का उस व्यक्ति को मिलना चाहिए जिसे इसकी सच में ज़रूरत हो।"
वे गाँव में आए और लोगों को देखने लगे। उन्होंने देखा कि किसान खुश थे, बच्चे खेल रहे थे और सभी के चेहरों पर मुस्कान थी। वहाँ कोई भी ऐसा नहीं था जो गरीबी या अभाव में जी रहा हो। वे सोच में पड़ गए कि यह सिक्का किसे दें।
तभी अचानक, घोड़ों के टापों और सैनिकों के शोर से शांति भंग हो गई। उस राज्य का राजा अपनी विशाल सेना के साथ वहाँ से गुजर रहा था। साधु ने राजा को रोका और पूछा, "महाराज, आप इतनी जल्दी में कहाँ जा रहे हैं?"
राजा ने गर्व से उत्तर दिया, "मैं पड़ोसी राज्य पर हमला करने जा रहा हूँ। जब मैं उस राज्य को जीत लूँगा, तो मेरे पास बहुत सारा सोना और धन होगा। तब मैं वास्तव में अमीर बन जाऊँगा!"
साधु ने मुस्कुराते हुए वह सोने का सिक्का राजा की ओर बढ़ाया। राजा हैरान रह गया और बोला, "यह क्या है?"
साधु ने शांति से कहा, "महाराज, मैं इस सिक्के को किसी ज़रूरतमंद को देने के लिए ढूँढ रहा था। लेकिन इस गाँव में तो हर कोई खुश और संतुष्ट है। केवल आप ही ऐसे हैं जिन्हें और अधिक चाहिए। आपके पास सब कुछ होते हुए भी दूसरों की चीज़ों को छीनने की इच्छा रखना ही आपकी असली गरीबी है। आप धन से नहीं, मन से गरीब हैं।"
राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसे समझ आ गया कि असली अमीरी धन में नहीं, बल्कि संतोष में है। उसने तुरंत अपना युद्ध रोक दिया और अपने राज्य में शांति से रहने का निर्णय लिया।
Moral
संतोष ही सबसे बड़ा धन है; लालच इंसान को भीतर से गरीब बना देता है।