पहाड़ों की तलहटी में कवी और अर्जुन नाम के दो पक्के दोस्त रहते थे। वे हमेशा साथ रहते थे। एक दिन, उन्होंने जंगल के एक नए रास्ते पर घूमने जाने का फैसला किया।
जंगल के बीचों-बीच पहुँचते ही, झाड़ियों में एक ज़ोरदार हलचल हुई। एक विशाल और गुस्सैल जंगली सूअर उनकी ओर तेजी से दौड़ता हुआ आया। दोनों डर के मारे कांपने लगे। कवी फुर्तीला था, वह तुरंत पास की एक ऊँची चट्टान पर चढ़ गया। लेकिन अर्जुन, जो उतना तेज़ नहीं था, बीच रास्ते में ही फंस गया। कवी ने अपने दोस्त की मदद करने के बजाय केवल अपनी जान बचाने के बारे में सोचा।
अर्जुन को अपने दादाजी की बात याद आई: 'जंगली जानवर बिना हलचल वाली चीज़ों को नहीं छेड़ते।' अर्जुन ने तुरंत ज़मीन पर लेटकर अपनी साँसें रोक लीं और मरने का नाटक करने लगा। सूअर उसके पास आया, उसे सूंघा, लेकिन अर्जुन को बिल्कुल भी हिलते हुए नहीं पाया। सूअर को लगा कि वह मर चुका है, और वह वहाँ से चला गया।
जब खतरा टल गया, तो कवी चट्टान से नीचे उतरा। उसका चेहरा शर्मिंदगी से लाल था। उसने कहा, "अर्जुन, मुझे माफ़ कर दो! मैं डर गया था और तुम्हें अकेला छोड़ दिया।"
अर्जुन शांत भाव से खड़ा हुआ और बोला, "जो दोस्त मुसीबत के समय साथ छोड़ दे, उससे अकेला चलना ही बेहतर है।" अर्जुन अकेले ही आगे बढ़ गया, और कवी अपने स्वार्थ पर पछताता रह गया।
Moral
मुसीबत में साथ छोड़ने वाला मित्र सच्चा मित्र नहीं होता।