एक छोटे से घर की रसोई में दो बर्तन रहते थे। एक था मिट्टी का घड़ा और दूसरा था चमकता हुआ पीतल का बर्तन। मिट्टी का घड़ा बहुत कोमल और नाजुक था, जबकि पीतल का बर्तन बहुत मजबूत और कठोर था।
एक सुबह एक चमत्कार हुआ! दोनों बर्तनों को छोटे-छोटे पैर निकल आए। पीतल का बर्तन खुशी से नाचने लगा। "देखो! अब हमें इस रसोई में कैद रहने की ज़रूरत नहीं है। हम जंगलों और पहाड़ों की सैर कर सकते हैं, आज़ादी से घूम सकते हैं! चलो चलते हैं!" वह चिल्लाया।
मिट्टी का घड़ा डर गया। उसने कहा, "मित्र, हमें यहीं रुक जाना चाहिए। मैं बहुत नाजुक हूँ। अगर हम तेज़ दौड़ते हैं और मैं तुम्हारी कठोर सतह से टकरा गया, तो मैं टूट जाऊँगा। हम दोनों एक जैसे नहीं हैं।"
पीतल के बर्तन ने उसका मज़ाक उड़ाया। "तुम बहुत डरपोक हो! रोज़ इस रसोई की गर्मी में रहने से अच्छा है कि हम दुनिया देखें। चलो मेरे साथ!"
पीतल के बर्तन के ज़ोर देने पर, मिट्टी का घड़ा भी उसके साथ चल दिया। वे दोनों एक पथरीले रास्ते पर तेज़ी से दौड़ने लगे। पीतल का बर्तन बहुत गर्व से ऊँची-ऊँची छलाँगें लगा रहा था। तभी, एक मोड़ पर पीतल का बर्तन तेज़ी से मुड़ा और मिट्टी का घड़ा उसके कठोर किनारे से ज़ोर से टकरा गया।
'कड़क!' की आवाज़ के साथ मिट्टी का घड़ा सैकड़ों टुकड़ों में टूट गया। पीतल का बर्तन बहुत दुखी हुआ, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। उसे समझ आ गया कि अपनी प्रकृति से अलग स्वभाव वाले के साथ दोस्ती करना कितना भारी पड़ सकता है।
Moral
हमेशा अपने स्वभाव और सामर्थ्य के अनुकूल मित्र ही बनाने चाहिए।