पहाड़ों के बीच बसे एक सुंदर राज्य में राजकुमारी लूना रहती थी। लूना के पास रेशमी कपड़े और सुंदर गहने थे, लेकिन वह कभी खुश नहीं रहती थी। वह हमेशा कहती, 'मुझे इससे भी बड़ा महल चाहिए और इससे भी चमकते हुए हीरे चाहिए!'
एक दिन उसने अपनी माँ से ज़िद की, 'माँ, मुझे दुनिया की सबसे कीमती चीज़ें चाहिए!' उसकी माँ ने समझाया कि जो हमारे पास है हमें उसी में खुश रहना चाहिए, पर लूना ने उनकी बात नहीं मानी। तभी दो जादुई परियाँ वहाँ आईं और उन्होंने लूना की हर इच्छा पूरी करने का वरदान दे दिया। देखते ही देखते लूना का कमरा सोने, गहनों और ढेर सारे कपड़ों से भर गया। उसकी सेवा के लिए बहुत सारे सेवक भी आ गए।
शुरुआत में लूना बहुत खुश हुई, लेकिन जल्द ही उसे परेशानी होने लगी। सेवक हर समय उसके आसपास रहते थे। वह न तो शांति से खेल सकती थी और न ही चैन से सो सकती थी। उसे अपना अकेलापन और आज़ादी खोती हुई महसूस हुई। वह बहुत परेशान हो गई।
रोते हुए लूना अपनी माँ के पास गई और बोली, 'माँ, मुझे ये सब नहीं चाहिए! मुझे मेरा पुराना जीवन ही वापस दे दो!' उसकी बात सुनकर परियाँ वापस आईं और जादू से वह सब कुछ गायब कर दिया। लूना को समझ आ गया कि शांति और खुशी चीज़ों में नहीं, बल्कि संतोष में है।
Moral
लालच इंसान की शांति छीन लेता है; संतोष ही असली सुख है।