एक घने और हरे-भरे जंगल में रंग-बिरंगे पक्षी मिल-जुलकर रहते थे। वे जंगल के फल और बीज खाकर अपना जीवन बिताते थे। लेकिन एक दिन, लोमड़ियों का एक झुंड उस जंगल में आ गया। लोमड़ियों को देखकर सभी पक्षी डर गए और अपनी सुरक्षा के लिए सोचने लगे।
पक्षियों ने मिलकर एक योजना बनाई। उन्होंने जंगल के सबसे ऊंचे पेड़ की चोटी पर एक ऊँची निगरानी मीनार बनाई। उन्होंने नियम बनाया कि हर दिन एक पक्षी उस मीनार पर बैठकर पहरा देगा। अगर कोई लोमड़ी दिखेगी, तो वह जोर से चिल्लाकर सबको सावधान कर देगा।
कई दिनों तक सब कुछ ठीक चला। एक दिन, एक कठफोड़वे की बारी आई। कठफोड़वा बहुत फुर्तीला था, लेकिन उसे एक जगह टिक कर बैठना पसंद नहीं था। जब वह मीनार पर बैठा, तो जंगल बहुत शांत था। कोई लोमड़ी कहीं नज़र नहीं आ रही थी।
"उफ़! कितना बोरियत भरा काम है!" कठफोड़वे ने खुद से कहा। "यहाँ तो कुछ भी नहीं हो रहा। क्यों न मैं इस लकड़ी का ही इस्तेमाल कर लूँ!"
बोरियत मिटाने के लिए, वह उस मीनार की लकड़ियों को ही खोदने लगा। ठक! ठक! ठक! वह लकड़ी को अंदर तक खोदता गया। अचानक, एक तेज़ आवाज़ के साथ, वह मीनार टूटकर नीचे गिर गई।
सभी पक्षी घबराकर वहाँ पहुँचे। उन्हें एहसास हुआ कि अगर उस समय लोमड़ी आ जाती, तो बिना मीनार के वे किसी को चेतावनी नहीं दे पाते और सब खतरे में पड़ जाते। कठफोड़वे को अपनी गलती पर बहुत पछतावा हुआ।
अगले दिन, सभी पक्षियों ने मिलकर फैसला किया कि अगली बार से केवल उन्हीं पक्षियों को ज़िम्मेदारी दी जाएगी जो धैर्यवान और सावधान हों।
Moral
लापरवाही से किया गया काम पूरे समूह के लिए संकट पैदा कर सकता है।