गाँव के बाहर एक विशाल खुले मैदान में एक बड़ा सांस्कृतिक उत्सव आयोजित किया जा रहा था। चारों ओर हरियाली तो थी, लेकिन सूरज की तपिश बहुत तेज़ थी। वहाँ छाया देने के लिए एक छोटा सा पेड़ भी नहीं था।
कार्यक्रम के मुख्य कलाकार कवि, एक बड़े रंगीन छाते की छाया में आराम कर रहे थे। उनका सहायक छाता थामे खड़ा था। तभी कवि की नज़र वहाँ काम कर रही एक महिला पर पड़ी। वह अपने नन्हे बच्चे को सीने से लगाए कड़ी धूप में संघर्ष कर रही थी।
धूप के कारण बच्चे का चेहरा लाल हो गया था और माँ के माथे पर पसीने की बूंदें थीं। यह देखकर कवि का हृदय द्रवित हो उठा। वे तुरंत अपनी जगह से उठे और उनके पास गए।
"बहन, कृपया आप और आपका बच्चा इस छाते की छाया में आ जाइए। इस तेज़ धूप में बच्चे को बहुत तकलीफ हो रही है। मैं यहाँ धूप में खड़ा हो जाऊँगा," कवि ने बड़े प्यार से कहा।
महिला घबरा गई और बोली, "अरे नहीं साहब! आप इतने बड़े कलाकार हैं, आप धूप में कैसे खड़े हो सकते हैं? हम इस गर्मी को सह लेंगे।"
लेकिन कवि नहीं माने। उन्होंने अपने सहायक को बुलाया और कहा, "छाता इन्हें दे दो, ये छाया में रहेंगे। मैं यहाँ धूप में खड़ा रहूँगा।"
पूरे समय कवि धूप में खड़े रहे और माँ-बच्चा छाते की ठंडी छाया में रहे। काम खत्म होने के बाद, कवि ने उन्हें केवल उतना ही नहीं दिया जितना तय हुआ था, बल्कि उनकी मदद के लिए बहुत सारी अतिरिक्त राशि भी दी। एक छोटे से छाते की छाया ने एक बड़े दिल की उदारता को दर्शा दिया।
Moral
दूसरों की पीड़ा को समझना और मदद करना ही सच्ची मानवता है।