एक सुंदर राज्य में कवि नाम का एक साहसी युवक रहता था। वह अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए जाना जाता था। उसकी बहादुरी से नाराज होकर राजा ने उसे कड़ी सजा सुना दी।
जेल में रहते हुए कवि ने राजा से एक विनती की, "महाराज, सजा शुरू होने से पहले मुझे अपनी वृद्ध माँ से एक बार मिलने की अनुमति दें। वे मेरा इंतजार कर रही हैं।"
लेकिन राजा ने मना कर दिया, "कानून सबके लिए समान है, मैं तुम्हारे लिए कोई विशेष रियायत नहीं दे सकता।"
कवि के सबसे अच्छे दोस्त अर्जुन ने यह देखा और साहस के साथ राजा के सामने आए। "महाराज, कवि को घर जाने दें। उसकी जगह मैं सजा भुगतने को तैयार हूँ। मैं अपने मित्र को इस तरह अकेला नहीं छोड़ सकता।"
अर्जुन के त्याग को देखकर राजा मान गए। कवि जल्दी से घर गया, लेकिन रास्ते में भारी तूफान के कारण उसे लौटने में देर हो गई। जब तक कवि महल पहुँचा, सजा की तैयारी हो रही थी।
कवि रोते हुए अर्जुन के पास भागा, "मित्र, मुझे क्षमा कर दो! मैं देर से आया। कृपया मुझे छोड़ दें और मुझे सजा दें!"
अर्जुन ने शांति से मुस्कुराते हुए कहा, "कवि, तुमने अपनी माँ की सेवा कर ली, वही सबसे महत्वपूर्ण है। एक दोस्त के रूप में तुम्हारे साथ खड़ा रहना मेरा कर्तव्य है।"
दोनों मित्रों के इस अटूट प्रेम और बलिदान को देखकर राजा का हृदय पिघल गया। राजा ने कहा, "मैंने ऐसी सच्ची मित्रता पहले कभी नहीं देखी। तुम्हारी दोस्ती के आगे मेरी सजा हार गई है।" राजा ने दोनों को आजाद कर दिया।