एक छोटे से गाँव में कविन नाम का एक युवक रहता था। पिछले कुछ समय से उसे लग रहा था कि उसका जीवन दुखों से भरा है। छोटी-छोटी परेशानियाँ भी उसे बहुत बड़ी लगने लगी थीं। अपनी मानसिक शांति खोजने के लिए, वह पहाड़ी पर रहने वाले एक ज्ञानी साधु के पास गया।
साधु ने कविन की उदासी को भाँप लिया। उन्होंने कविन को एक छोटा सा मिट्टी का पात्र दिया जिसमें पानी था और एक मुट्ठी नमक दिया। उन्होंने कहा, "इस नमक को इस पानी में डालो और फिर एक घूँट पियो।"
कविन ने वैसा ही किया। जैसे ही उसने पानी पिया, उसका मुँह कड़वा हो गया। "यह तो बहुत खारा है! इसे पीना तो नामुमकिन है," कविन ने चिढ़कर कहा।
साधु मुस्कुराए और उसे एक और मुट्ठी नमक देकर पास की एक बड़ी और सुंदर झील के पास ले गए। उन्होंने कहा, "अब इस नमक को इस झील में डाल दो और फिर झील का पानी पियो।"
कविन ने नमक झील में डाल दिया और फिर झील के किनारे बैठकर पानी पिया। वह हैरान रह गया और बोला, "यह पानी तो बहुत मीठा और ताज़ा है!"
साधु ने कविन के कंधे पर हाथ रखा और समझाया, "कविन, जीवन के दुख इस नमक की तरह ही हैं। वे हमेशा एक जैसे ही रहेंगे, न बढ़ेंगे न घटेंगे। लेकिन वे तुम्हें कितना परेशान करेंगे, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्हारा मन कितना बड़ा है।"
"अगर तुम्हारा मन इस छोटे पात्र की तरह छोटा है, तो थोड़ा सा दुख भी तुम्हें बहुत ज़्यादा तकलीफ देगा। लेकिन अगर तुम इस झील की तरह विशाल मन रखोगे, तो कितने भी दुख क्यों न आएं, वे तुम्हारे अंदर समा जाएंगे और तुम्हें परेशान नहीं कर पाएंगे। अपना ध्यान दुखों पर नहीं, अपने कर्मों पर लगाओ।"
कविन को अपनी गलती समझ आ गई। उसे समझ आया कि समस्याएँ नहीं, बल्कि हमारा नज़रिया हमें दुखी करता है। वह एक शांत मन के साथ अपने घर लौट आया।
Moral
जीवन के दुखों का प्रभाव हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।