एक घने और हरे-भरे जंगल में मणि नाम का एक फुर्तीला खरगोश रहता था। एक दिन, मणि एक सुंदर सब्जी के बगीचे की तलाश में निकला। चलते-चलते उसके रास्ते में एक छोटी सी नदी आई, जिस पर लकड़ी का एक बहुत ही संकरा पुल बना था।
मणि जैसे ही पुल पर आगे बढ़ा, उसने देखा कि दूसरी तरफ से सोमू नाम का एक और खरगोश आ रहा है। पुल इतना पतला था कि एक बार में केवल एक ही खरगोश निकल सकता था।
'ए सोमू! थोड़ा किनारे हो जाओ, पहले मुझे जाने दो!' मणि ने चिल्लाकर कहा।
सोमू ने गुस्से में जवाब दिया, 'नहीं! मैंने यह पुल पहले देखा है, इसलिए पहले मैं जाऊँगा!'
'लेकिन मैं पहले ही चलना शुरू कर चुका हूँ, रास्ता मेरा है!' मणि ने ज़िद करते हुए कहा। दोनों खरगोश बहस करते हुए पुल के बिल्कुल बीच में आ गए।
बहस करने के चक्कर में दोनों का ध्यान अपने पैरों पर नहीं था। अचानक, मणि का पैर फिसल गया! सोमू ने उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन वह भी अपना संतुलन खो बैठा और दोनों छपाक से नदी के ठंडे पानी में गिर गए।
गीले और ठिठुरते हुए, वे नदी के किनारे पहुँचे। मणि ने दुखी होकर कहा, 'अगर हम ज़िद न करते और एक-दूसरे को रास्ता दे देते, तो हम अब तक बगीचे में मज़े कर रहे होते।' सोमू को भी अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने वादा किया कि वे आगे से कभी ज़िद नहीं करेंगे और मिल-जुलकर रहेंगे।
Moral
ज़िद मुसीबत लाती है; मिल-जुलकर रहने में ही भलाई है।