एक घने जंगल में सैमी नाम की एक लोमड़ी रहती थी। सैमी को लगता था कि वह बहुत चतुर है, लेकिन वह अक्सर दूसरों को बेवकूफ बनाने की कोशिश करती थी। एक दिन, भोजन की तलाश में घूमते समय, सैमी का ध्यान भटक गया और वह एक शिकारी के बिछाए हुए जाल में फंस गई। उसका झाड़ीदार पूंछ उस जाल में बुरी तरह फंस गया।
सैमी घबरा गई। उसने खुद को छुड़ाने के लिए बहुत जोर लगाया, लेकिन जाल से उसका निकलना मुश्किल था। अंत में, एक ज़ोरदार झटके के साथ वह जाल से बाहर तो निकल आई, लेकिन उसकी पूंछ जाल में ही रह गई! सैमी दर्द से कराहते हुए वहां से भाग गई। अब वह बहुत शर्मिंदा थी। उसने सोचा, "अगर मैं इस तरह अपनी पूंछ के बिना वापस जाऊंगी, तो सब मुझ पर हँसेंगे!"
अपनी इस गलती को छिपाने के लिए सैमी ने एक चालाकी भरी योजना बनाई। वह लोमड़ियों के झुंड के पास गई और बहुत गंभीर चेहरा बनाकर बात करने लगी। "मेरे प्यारे दोस्तों," सैमी ने लंबी आह भरते हुए कहा, "मैंने एक बहुत बड़ी सच्चाई जानी है। भगवान ने हमें देखने के लिए आँखें, सुनने के लिए कान और खाने के लिए मुँह दिया है। लेकिन क्या इन पूंछों की ज़रूरत है? ये पूंछ तो बस हमें झाड़ियों में फंसाती हैं और हमारी रफ्तार कम करती हैं। मैंने अपनी पूंछ हटा दी है, और देखो अब मैं कितनी तेज़ी से दौड़ सकती हूँ! तुम सबको भी अपनी पूंछ काट देनी चाहिए!"
बाकी लोमड़ियाँ सैमी की बात सुनकर सोचने लगीं। तभी झुंड की एक बुद्धिमान लोमड़ी आगे आई और मुस्कुराते हुए पूछा, "सैमी, अगर तुमने सच में अपनी पूंछ खुद काटी है, तो फिर तुम इतनी परेशान और डरी हुई क्यों दिख रही हो? और तुमने इसे काटने के लिए किस चीज़ का इस्तेमाल किया?"
सैमी सन्न रह गई। वह कुछ नहीं बोल पाई। सबको समझ आ गया कि वह अपनी गलती छिपाने के लिए झूठ बोल रही है। "तुम हमें बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रही हो!" बाकी लोमड़ियाँ गुस्से में चिल्लाईं। अपनी पोल खुलते देख, सैमी शर्मिंदा होकर वहां से भाग गई।
Moral
अपनी गलती को छिपाने के लिए बोला गया झूठ अंत में अपमान का कारण बनता है।