एक घने जंगल में भालू का एक बड़ा सा झुंड रहता था, जिसमें 'बलू' नाम का एक भालू था। बलू बहुत ही गुस्सैल स्वभाव का था। उसे छोटी-छोटी बातों पर बहुत गुस्सा आता था, इसलिए जंगल के बाकी जानवर उससे दूर ही रहते थे।
एक दोपहर, बलू को बहुत तेज़ भूख लगी थी। वह खाने की तलाश में इधर-उधर घूम रहा था कि तभी उसे एक पेड़ की टहनी पर एक बड़ा सा शहद का छत्ता दिखाई दिया। 'वाह! आज तो दावत होगी!' बलू ने खुश होकर सोचा।
वह अपने भारी पंजों से शहद निकालने के लिए छत्ते को टटोलने लगा। तभी एक छोटी सी मधुमक्खी ने देखा कि बलू छत्ते को नुकसान पहुँचा रहा है। अपनी रक्षा के लिए, उस नन्हीं मधुमक्खी ने बलू की नाक पर ज़ोर से काट लिया।
'आह! बहुत दर्द हो रहा है!' बलू चिल्लाया। उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। 'मैं इस जंगल का सबसे बड़ा जानवर हूँ और एक छोटी सी मक्खी मुझे काट सकती है?' गुस्से में आकर उसने पूरे छत्ते को ही तोड़ डालने की कोशिश की।
यह उसकी सबसे बड़ी गलती थी। छत्ते पर हमला होते देख, मधुमक्खियों का पूरा झुंड बाहर निकल आया। वे बलू के चारों ओर मंडराने लगे और उसके कान, पीठ और पैरों पर काटने लगे। 'बचाओ! मुझे छोड़ दो! बहुत दर्द हो रहा है!' बलू चिल्लाते हुए तेज़ी से भागा, लेकिन मधुमक्खियाँ उसका पीछा नहीं छोड़ रही थीं।
बचने के लिए बलू ने पास ही के एक गहरे तालाब में छलांग लगा दी। वह पानी के अंदर तब तक रहा जब तक मधुमक्खियाँ वहाँ से चली नहीं गईं। जब वह बाहर निकला, तो वह बहुत थका हुआ और दर्द में था। उसे समझ आ गया कि अगर उसने गुस्सा न किया होता, तो उसे यह सब नहीं सहना पड़ता।
Moral
क्रोध हमेशा मुसीबत लाता है; धैर्य रखना ही समझदारी है।