भीषण गर्मी का समय था। कवि और अर्जुन नाम के दो यात्री एक लंबी यात्रा पर थे। सूरज की तपिश इतनी तेज़ थी कि ज़मीन आग की तरह तप रही थी। प्यास और थकान के कारण उनकी हालत खराब हो रही थी।
राहत की तलाश में भटकते हुए, उन्हें दूर एक विशाल बरगद का पेड़ दिखाई दिया। उसकी शाखाएँ एक बड़े छाते की तरह फैली हुई थीं, जो ज़मीन पर घनी और ठंडी छाया दे रही थीं। पेड़ पर पक्षी शांति से बैठे थे।
दोनों दोस्त दौड़कर पेड़ की छाया में जा बैठे। उस ठंडक ने उन्हें बहुत राहत दी। लेकिन कवि को बहुत भूख लगी थी। वह तुरंत पेड़ पर चढ़ गया और देखने लगा कि क्या वहां कोई मीठे फल हैं। लेकिन वह पेड़ फलों का नहीं था, वह केवल छाया देने वाला पेड़ था।
निराश होकर कवि नीचे आया और बोला, "यह पेड़ बिल्कुल बेकार है! यह सिर्फ छाया देता है, भूख मिटाने के लिए एक फल भी नहीं है!"
अर्जुन ने शांति से कहा, "कवि, तुम गलत सोच रहे हो। अगर इस पेड़ की छाया न होती, तो हम धूप में बेहोश हो जाते। इस पेड़ ने हमें वह दिया है जिसकी हमें इस समय सबसे ज़्यादा ज़रूरत है—जीवन और आराम। हमें इसकी बुराई करने के बजाय इसका शुक्रिया अदा करना चाहिए।"
कवि को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने महसूस किया कि कभी-कभी जो चीज़ हमें चाहिए होती है, उससे ज़्यादा ज़रूरी वह चीज़ होती है जो हमें वास्तव में बचा सकती है।
Moral
हमें मिलने वाली मदद का सम्मान करना चाहिए, चाहे वह हमारी उम्मीद के मुताबिक न हो।