एक शांत जंगल के आश्रम में, गुरुदेव आनंद अपने शिष्यों को जीवन के पाठ पढ़ा रहे थे। एक शाम, उन्होंने शिष्यों की ईमानदारी परखने के लिए एक अनोखी चुनौती दी।
गुरुदेव ने कहा, "कल सुबह आप सभी को अपने घर के भंडार से एक मुट्ठी अनाज लाना है। लेकिन शर्त यह है कि आप इसे चोरी-छिपे लाएँ, ताकि किसी को पता न चले।"
अगली सुबह, सभी शिष्य गर्व के साथ आए। सबके पास छोटी थैलियों में अनाज था। वे आपस में फुसफुसा रहे थे कि उन्होंने कितनी चतुराई से अनाज चुराया। लेकिन माधव खाली हाथ खड़ा था।
गुरुदेव ने माधव की ओर देखा और पूछा, "माधव, तुम खाली हाथ क्यों आए हो? क्या तुम डर गए थे?"
माधव ने विनम्रता से सिर झुकाया और कहा, "गुरुदेव, मैं अनाज लेने गया था, लेकिन जैसे ही मैंने हाथ बढ़ाया, मुझे लगा कि कोई देख तो नहीं रहा? फिर मुझे एहसास हुआ कि भले ही घर का कोई सदस्य मुझे न देख रहा हो, लेकिन मेरी अपनी अंतरात्मा मुझे देख रही है। मैं अपनी ही नज़रों में गिरना नहीं चाहता था।"
गुरुदेव मुस्कुराए और बोले, "माधव, दुनिया को धोखा देना आसान है, लेकिन खुद को धोखा देना सबसे बड़ा पाप है। तुमने अपनी अंतरात्मा की बात मानकर सबसे कठिन परीक्षा पास कर ली है।"
Moral
सच्ची ईमानदारी वह है जब आप अकेले में भी सही काम करते हैं क्योंकि आपकी अंतरात्मा आपको देख रही होती है।