नीलगिरी की सुंदर वादियों में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। वह हवा की तरह तेज़ दौड़ता था। गाँव में जब भी दौड़ प्रतियोगिता होती, अर्जुन ही विजेता बनकर उभरता था। उसकी रफ़्तार देखकर सब दंग रह जाते थे।
एक बार गाँव के मुखिया ने एक बड़ी दौड़ का आयोजन किया। अर्जुन दौड़ने के लिए तैयार हुआ। जैसे ही दौड़ शुरू हुई, भीड़ चिल्लाने लगी, "भागो अर्जुन, भागो!" लोगों के उत्साह ने अर्जुन में जोश भर दिया और वह बिजली की तरह दौड़कर जीत गया। उसके बाद एक और मज़बूत लड़के ने दौड़ लगाई और उसे भी लोगों का खूब समर्थन मिला।
अंत में, एक बुजुर्ग व्यक्ति और एक छोटा बच्चा, जिसके पैर में चोट थी, दौड़ में शामिल हुए। उन्हें देखकर भीड़ अचानक शांत हो गई। लोगों ने उत्साह दिखाना बंद कर दिया। अर्जुन दौड़ने लगा, लेकिन जब उसने पीछे मुड़कर देखा, तो उसे बुजुर्ग की धीमी चाल और बच्चे का दर्द महसूस हुआ।
अर्जुन का मन बदल गया। उसने सोचा कि अकेले जीतना क्या वाकई बड़ी बात है? वह दौड़कर आगे जाने के बजाय वापस आया। उसने बुजुर्ग का हाथ थामा और उस बच्चे को अपने कंधे का सहारा दिया। तीनों मिलकर धीरे-धीरे आगे बढ़े और एक साथ ही फिनिश लाइन को पार किया।
यह देखकर पूरा गाँव खड़ा हो गया और ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाने लगा। यह तालियाँ अर्जुन की पिछली जीत से कहीं ज़्यादा तेज़ और दिल से थीं। अर्जुन ने हैरानी से मुखिया जी से पूछा, "मुखिया जी, जब मैं तेज़ दौड़ रहा था तब इतनी तालियाँ नहीं बजीं, फिर अब इतनी शोर क्यों हो रहा है?"
मुखिया जी मुस्कुराए और बोले, "अर्जुन, पहले लोग तुम्हारी रफ़्तार के लिए तालियाँ बजा रहे थे, लेकिन आज वे तुम्हारे बड़े दिल के लिए तालियाँ बजा रहे हैं। सच्चा विजेता वही है जो दूसरों को अकेला नहीं छोड़ता, बल्कि सबको साथ लेकर चलता है।"
Moral
असली जीत केवल खुद आगे बढ़ने में नहीं, बल्कि दूसरों को साथ लेकर चलने में है।