एक सुंदर से गाँव में कविन नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत ही होनहार था, लेकिन उसकी एक आदत थी कि वह बिना सोचे-समझे जल्दबाजी में काम करता था। एक दिन, उसके पिता लकड़ी का एक बहुत ही सुंदर डिब्बा बना रहे थे। उसे पूरा करने के बाद, पिता ने कहा, 'कविन, इसे रसोई की मेज पर सावधानी से रख देना,' और वे बाहर चले गए।
कविन डिब्बा लेकर जा ही रहा था कि उसका दोस्त रवि एक नई गेंद के साथ दौड़ता हुआ आया। 'कविन, आओ खेलते हैं!' रवि ने उत्साह से कहा। कविन का मन भी खेलने के लिए ललचा गया। लेकिन उसे पता था कि अगर वह अभी खेलने लगा, तो शायद डिब्बा गिर जाए या वह अपना काम भूल जाए।
कविन के मन में द्वंद्व चल रहा था। उसने सोचा, 'अभी खेलना मज़ेदार तो होगा, लेकिन यह सही नहीं है। अभी मेरा कर्तव्य डिब्बे को सुरक्षित जगह पर रखना है।' उसने रवि से कहा, 'रवि, अभी नहीं, मैं अपना काम पूरा करके आता हूँ।' कविन धीरे-धीरे चला और डिब्बे को मेज पर सही ढंग से रख दिया।
जब वह वापस आया, तो रवि उसका इंतज़ार कर रहा था। कविन को अपने काम को सही ढंग से पूरा करने पर बहुत शांति और गर्व महसूस हुआ। उसने सीखा कि सही समय पर सही निर्णय लेना ही सबसे बड़ी जीत है।