एक छोटे से गाँव में सोमू और उसकी पत्नी मीना रहते थे। सोमू बहुत मेहनती था और मीना बहुत ही दयालु स्वभाव की थी। वे अपने छोटे से घर और बगीचे में बहुत खुश रहते थे। एक दिन एक साधु उनके घर के पास से गुजरे। सोमू को देखकर साधु ने कहा, 'बेटा, तुम इस सांसारिक जीवन में क्यों उलझे हुए हो? सब कुछ त्याग कर मेरे साथ वन में चलो और तपस्या करो। तभी तुम्हें सच्चा सुख मिलेगा।'
सोमू सोचने लगा। उसने मीना की मुस्कान, अपने बगीचे के फूलों की खुशबू और दूसरों की मदद करने से मिलने वाली शांति के बारे में सोचा। उसे महसूस हुआ कि ईमानदारी से अपना काम करना और परिवार का ख्याल रखना भी एक तरह की पूजा ही है।
उसने साधु से कहा, 'महाराज, मैं अपने गृहस्थ जीवन में धर्म का पालन कर रहा हूँ। अपने परिवार के प्रति कर्तव्यों को निभाना और सच्चाई के मार्ग पर चलना मुझे शांति देता है। यदि कोई व्यक्ति अपने घर में रहकर धर्मपूर्वक जीवन बिता सकता है, तो फिर अकेले वन में जाकर तपस्या करने का क्या लाभ?' साधु सोमू की समझदारी देखकर मुस्कुरा दिए।