एक छोटे से गाँव में दो दोस्त रहते थे, आर्यन और समीर। आर्यन बहुत ही शांत और समझदार लड़का था, जबकि समीर थोड़ा चंचल था और बिना सोचे-समझे काम करता था।
एक दिन जंगल के रास्ते से जाते समय समीर को ज़मीन पर एक बटुआ मिला। जब उसने उसे खोला, तो देखा कि वह सोने के सिक्कों से भरा था। समीर की आँखें चमक उठीं। 'आर्यन, देखो! यह हमारी किस्मत है!' समीर ने फुसफुसाते हुए कहा। 'कोई देख नहीं रहा है, चलो इसे रख लेते हैं!'
आर्यन का मन घबराने लगा। 'समीर, यह हमारा नहीं है। जिसका भी यह है, वह बहुत परेशान होगा। इसे लेना गलत है,' आर्यन ने धीरे से कहा।
समीर हँसा, 'अरे डरपोक मत बनो! अगर हम पकड़े नहीं गए, तो डरने की क्या बात है?'
लेकिन आर्यन पकड़े जाने से नहीं डर रहा था। उसे डर लग रहा था उस अहसास से कि उसने कुछ गलत किया है। उसे डर था कि अगर उसने यह बटुआ रख लिया, तो वह कभी चैन से नहीं सो पाएगा। उसने बटुआ लेकर गाँव के मुखिया को सौंप दिया।
पता चला कि वह बटुआ एक बूढ़ी दादी का था, जो अपनी दवाइयों के लिए पैसे जमा कर रही थीं। मुखिया ने बटुआ उन्हें लौटा दिया। दादी की आँखों में खुशी के आँसू देखकर आर्यन को सुकून मिला।
समीर ने पूछा, 'आर्यन, तुम इतना क्यों डर रहे थे?'
आर्यन ने जवाब दिया, 'समीर, मुझे सजा का डर नहीं था, मुझे इस बात का डर था कि कहीं मैं एक गलत काम करके उसे करने का गर्व तो नहीं करने लगूँगा। एक अच्छा इंसान गलत काम की खुशी बर्दाश्त नहीं कर सकता।'
समीर को उस दिन समझ आया कि असली बहादुरी गलत काम करने में नहीं, बल्कि सही काम करने में है।