एक छोटे से गाँव में रामू नाम का एक किसान रहता था। वह बहुत गरीब था, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था। रामू के पास चाहे कितना भी कम भोजन क्यों न हो, वह हमेशा अपने द्वार पर आए किसी भूखे व्यक्ति या यात्री को भोजन ज़रूर खिलाता था।
एक बार उस इलाके में भीषण सूखा पड़ा। फसलें सूख गईं और अनाज की भारी कमी हो गई। रामू के घर में भी खाने के लाले पड़ गए। एक शाम, एक बूढ़ा आदमी बहुत ही कमजोर और भूखा उसके दरवाजे पर आया। रामू के पास उस दिन के लिए बस थोड़ा सा ही भोजन बचा था, फिर भी उसने बिना सोचे वह भोजन उस बूढ़े व्यक्ति को प्रेम से खिला दिया।
भोजन करने के बाद उस वृद्ध ने मुस्कुराते हुए कहा, 'बेटा, जो दूसरों का पेट भरता है, ईश्वर उसका पेट कभी खाली नहीं रहने देता। भूख का दुख तुझे कभी नहीं छुएगा।'
कुछ ही समय बाद, गाँव के एक बड़े व्यापारी को रामू की इस उदारता के बारे में पता चला। वह रामू के स्वभाव से इतना प्रभावित हुआ कि उसने रामू को खेती के लिए नई ज़मीन और अनाज का भंडार उपहार में दिया। रामू ने अपना पूरा जीवन दूसरों की सेवा में बिताया और उसे कभी भी भूख की तड़प नहीं झेलनी पड़ी। उसकी दयालुता ही उसका सबसे बड़ा कवच बन गई।